संदेश

 

संख्या: 1

 

प्यारी साध संगत जी,

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

मैं इस संदेश के द्वारा आप सभी से दो बहुत ही महत्वपूर्ण विषयों पर अपने
विचार साँझे करना चाहता हूँ।

अन्न का आदर  :

मानव को ईश्वर की सबसे बड़ी देन है अन्न। अन्न अर्थात् भोजन मनुष्य को ईश्वर का दिया हुआ सबसे बड़ा प्रसाद है। यही कारण है कि हर धर्म में खाना खाने से पहले ईश्वर की प्रार्थना करके उनको धन्यवाद करने की परम्परा है। निश्चित रुप से अन्न वस्तुतः हमें जीने के लिए शक्ति एवं ऊर्जा प्रदान करता है एवं इसकी आवश्यकता सभी उम्र, वर्ग, जाति, प्रजाति, सामाजिक श्रेणी, देश इत्यादि के हर व्यक्ति को समान रुप से पड़ती है। न केवल मनुष्य जाति को अपितु पशु-पक्षी व कीट पंतगों को भी अपना जीवन यापन करने के लिए अन्न अथवा भोजन की अनिवार्य रुप से आवश्यकता होती है। अन्न के इसी महत्व को देखते हुए ही आदिकाल से अन्नदान को महान दान माना गया है व हमारे धर्म में लंगर अर्थात् भोजन करवाने की प्रथा व परम्परा को सबसे उत्तम व महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

मुझे यह देखकर बहुत दुःख होता है कि आज इस उन्नत, जागृत व पढ़े-लिखे समाज में भी बहुत से ऐसे व्यक्ति हैं जो अन्न के महत्व को (व मँहगाई को) जानते हुए भी भोजन झूठा छोड़ देते हैं व अन्न का निरादर करते हैं। हममें से बहुत लोग गुरुद्वारे, मंदिर इत्यादि में तो बहुत सचेत रहते हैं, परन्तु अपने व्यक्तिगत जीवन में व सामाजिक समारोहों (पार्टी, सभा इत्यादि) में अधिक मात्रा में भोजन लेने व झूठा छोड़ने की आदत से ग्रस्त हैं। प्रकृति में अन्य आवश्यक वस्तुओं की तरह अन्न अथवा भोजन का वितरण भी असमान है। बहुत भाग्यशाली हैं वे लोग जिनको प्रतिदिन पेट भर कर भोजन मिलता है, परन्तु कड़वा सत्य तो यह है कि आज भी दुनिया में लगभग आधी मानव जाति को दो वक्त की रोटी भी नसीब नहीं होती।

 

अन्न को झूठा छोड़ने या व्यर्थ करने से पहले हमें सौ बार उन व्यक्तियों के लिए सोचना चाहिए जो आज के इस विकसित युग में भी दिन में केवल एक ही बार भोजन करके अपना जीवन निर्वाह करते हैं। यदि भोजन या खाने की वस्तुऐं बच जाएँ तो उन्हें खराब होने से पहले ज़रुरतमंदों तक पहुँचा देना चाहिए। आजकल होटल, रेस्टोरेंट, गुरुद्वारे व मन्दिरों इत्यादि का अनाथालयों या ज़रुरतमंद संस्थाओं से करार होता है व अतिरिक्त भोजन समय रहते वहाँ तक पहुँचाया जा सकता है।

 

मैं आज आप सबसे यह विनती करता हूँ कि कृप्या करके ईश्वर की इस महत्वपूर्ण देन का आदर कीजिए और यह निश्चय कीजिए की आप स्वयं न तो भोजन को (घर, ऑफिस या कार्यस्थल, रेस्टोरेंट, होटल, पार्टी, सभा, लंगर, भन्डारे या किसी अन्य स्थल या समारोह में) झूठा छोड़ेंगे या व्यर्थ करेंगे और दूसरों को भी अन्न का यथा आदर करने के लिए हमेशा प्रेरित करते रहेंगे।


सफाई  :

सफाई प्रकृति का एक मौलिक गुण है व मनुष्य के बहुमुखी विकास में इसका बहुत बड़ा योगदान है। कहते हैं बिल्ली व कुत्ते भी बैठते समय अपनी पूँछ से ज़मीन साफ कर लेते हैं। सृष्टि में मनुष्य को सबसे श्रेष्ठ प्राणी माना गया है अतः मनुष्य में सफाई का स्तर सबसे ऊँचा होना चाहिए। यह भी कहा जाता है कि एक स्वच्छ शरीर में स्वस्थ मन का वास होता है व स्वच्छ एवं स्वस्थ मन में एक शुद्ध आत्मा का निवास होता है और आत्मा ही मनुष्य का परमपिता परमात्मा से मिलने का एकमात्र साधन है। नित्य प्रति स्नान, दाँतों की सफाई, कटे हुए नाखून, धुले एवं इस्त्री (Press) किए कपड़े (बेशक सस्ते व सादे क्यों न हों), साफ जूतों का पहनना प्रत्येक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वच्छता के लिए अति आवश्यक है।

 

लेकिन सफाई शरीर मात्र तक ही सीमित नहीं है। मनुष्य के आस-पास का हर वातावरण जैसे कि रहने, उठने-बैठने, सोने, खाने, खेलने, कार्य करने, आजीविका कमाने, पूजा पाठ इत्यादि हर क्रिया क्षेत्र का साफ-सुथरा होना अनिवार्य है। सफाई रखने का मतलब है कि बीमारियों से दूर रहना अर्थात् चिरायु होना और अपनी आने वाली पीढ़ियों को एक बेहतर भविष्य सौंपना। सफाई का अर्थ यह नहीं है कि अपने कूड़े या गन्दगी को सड़क पर, पड़ोसी के घर के सामने, किसी सार्वजनिक या अवाँछनीय स्थान पर फेंका जाए, यह तो गन्दगी का मात्र स्थानान्तरण है। कूड़े व गन्दगी को यथास्थान पर डालना व दूसरों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करना व सफाई के महत्व का यथा संभव प्रचार करना हर जागरुक नागरिक व व्यक्ति का कर्तव्य है। सफाई हमारे जीवन की एक महत्वपूर्ण आदत व संस्कार बन जानी चाहिए। मैं आपको बताना चाहूँगा कि जापान जो कि दुनिया के गिने-चुने सबसे प्रगतिशील देशों में से एक है वहाँ छोटे बच्चों को नर्सरी कक्षा में ही अध्यापक झाड़ू लगाना व सफाई करना सिखाते हैं ताकि सफाई उनके अस्तित्व व संस्कारों में बस जाए। यही नहीं वहाँ एवं यूरोप में जब पालतू कुत्तों के मालिक उन्हें सड़क या पार्क या किसी भी अन्य स्थान पर घुमाने के लिए ले जाते हैं, तो उनके शौच को इकट्ठा करने के लिए वे अपने साथ खास किस्म के बैग व सफाई के उपकरण भी ले जाते हैं।

 

कुछ दिन पहले एक समारोह में चारों तरफ फैली हुई गन्दगी (पेपर नैपकिन, थर्मोकोल व प्लास्टिक के गिलास, प्लेट व चम्मच, खाने-पीने की फैली हुई झूठन इत्यादि) देखकर मुझे बहुत दुःख व शर्मिन्दगी का एहसास हुआ। अत: मैं आप सबसे यह अनुरोध करूँगा कि आप सबसे पहले अपने शरीर एवं वातावरण को बिल्कुल साफ-सुथरा रखें व सफाई को अपने जीवन में एक मजबूरी की तरह नहीं बल्कि एक कर्तव्य व अनिवार्य आदत के रुप मे अपनायें व अपना व्यक्तिगत, अपने परिवार, समूह, समाज व राष्ट्र का उत्थान करें क्योंकि सफाई शारीरिक, आत्मिक, नैतिक, सामाजिक व आर्थिक रुप से व्यक्ति, समाज व राष्ट्र के विकास के लिए बहुत ज़रुरी है। अपने बच्चों में हर समय व हर परिस्थिति में सफाई रखने व करने की प्रेरणा व जागरुकता बचपन से ही अंकुरित व विकसित करें। दूसरों को भी सफाई के महत्व व तरीकों से हमेशा अवगत करवाते रहें। अन्त में मैं यही कहूँगा कि सफाई मनुष्य को ईश्वर की तरफ ले जाने वाला पहला कदम है जैसा कि किसी ने बहुत उपयुक्त कहा है

 

जहाँ है सफाई, वहाँ है खुदाई
Cleanliness is Next to Godliness

आशा करता हूँ कि आप सभी मेरे विचारों से सहमत होंगे व इनको अपने जीवन में अवश्य ही कार्यान्वित करेंगे व अपने प्रियजनों को भी इन्हें अपनाने के लिए प्रेरित करेंगे।


वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
गुरसंगत का दास
संतरेन डाॅ० हरभजन शाह सिंघ, गद्दी नशीन