संदेश

 

संख्या: 10

 

भाग : 01

प्यारी साध संगत जी,

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरू जी की फतेह ।

शादी  

शादी, ब्याह, विवाह, आनन्द कारज, निकाह, marriage आदि एक ही रस्म और रिश्ते के कई नाम हैं। शादी नाम की एक ही रस्म और रिश्ता अलग-अलग भाषाओं, समाजों, जातियों और धर्मों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है। यह एक सामाजिक, धार्मिक और कानूनी बंधन है जिसमें आदमी और औरत एक दूसरे के साथ भौतिक (शारीरिक, physical), भावात्मक (emotional) और आर्थिक (economically) रूप से जुड़ जाते हैं। शादी मानव इतिहास का सबसे पुराना और सबसे प्राकृतिक (natural) बंधन है। शादी वो पवित्र संस्कार है जिसमें दो अलग शख्सियतों का शारीरिक, बौद्धिक और आत्मिक मिलन होता है। शादी आदमी और औरत की biological (जैविक), भावात्मक (emotional), सामाजिक और आत्मिक ज़रूरतों को पूरा करती है। शादी समाज की बुनियादी इकाई और प्रमुख संस्था (cardinal institution) है। शादी ही समाज और देश की बुनियाद है और इंसान को सामाजिक और धार्मिक पहचान देती है। यह वह institution (संस्था) है जिसे समाज और कानून आदमी और औरत को जायज़ तरीके से एक साथ रहने और बच्चों को जन्म देने की इजाजत देता है। मानव जाति के विकास में शादी का बहुत बड़ा योगदान रहा है और इसकी वजह से ही परिवार, extended families, समाज, जाति, धर्म और देश आगे बढ़ते हैं। शादी को किसी भी समाज और देश की बुनियाद भी कहा जा सकता है। हमारे समाज और देश में शादी एक पवित्र बंधन है, पवित्र संस्कार और न तोड़ने वाली प्रतिज्ञा है जिसमें आदमी और औरत जिंदगी भर एक दूसरे का साथ निभाने का वचन देते हैं।

अगर हम शादी का इतिहास और शुरूआत देखें तो लाखों साल पहले आदि मानव जंगलों में जानवरों की तरह अकेले या झुण्ड में रहा करते थे। आदमी (नर) और औरत (मादा) में संबंध तब भी थे पर वो सिर्फ संबंध होता था ना कि कोई रिश्ता या बंधन। लेकिन तकरीबन 23000 साल पहले मानव - इतिहास में इंसान ने जब खेती बाड़ी करना शुरू किया तो यह संबंध धीरे-धीरे कच्चे पक्के रिश्ते का रूप लेने लगा और तकरीबन 4 हज़ार साल पहले जब खेती के लिए हल की ईजाद हुई तो पता चलता है कि आदमी और औरत के काम बँटने लगे। अब आदमी और औरत के संबंधों में पक्कापन आने लगा। आदमी शारीरिक रूप से मज़बूत और ताकतवर थे वो खेतों में जाकर खेती करने लगे जबकि औरतें घरों में रहकर बच्चों को जन्म देतीं, उनकी परवरिश करतीं, घर के और आस-पास के काम काज करतीं । धीरे-धीरे वक्त के साथ यह संबंध स्थायी होने लगा। बीतते वक्त के साथ रीति-रिवाजों का जन्म हुआ और शादी के रूप में पनपा आदमी और औरत का यह रिश्ता स्थायी होता चला गया जो आज हर समाज, धर्म, जाति और देश की संस्कृति का एक अटूट हिस्सा बन गया है। शादी ने हर पुराने समाज को अपनी जाति बढ़ाने का, रीति रिवाजों और परम्पराओं को बनाने और पनपने का, जाति को सुरक्षित रखने का और सम्पत्ति (दौलत, जायदाद) के अधिकार (rights) को आगे देने या बढ़ाने का और कई बुनियादी कायदे कानून बनाने का बहुत खूबसूरत मंच (platform) प्रदान किया।

पुराने ज़माने में हमारे समाज में इंसान की जिंदगी को चार आश्रमों में बाँटा गया था। ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और सन्यास । सभी नौजवान 25 साल की उम्र तक विद्यार्थी और शिष्य के रूप में पढ़ाई लिखाई करके ब्रह्मचर्य का पालन करते थे। उसके बाद शादी करके गृहस्थ आश्रम की शुरूआत करते थे जो कि तकरीबन 50 साल की उम्र तक कायम रहता था। "गृहस्थ" संस्कृत भाषा का एक शब्द है जो दो शब्दों से बना है, "गृह" का मतलब है 'घर, परिवार" और "स्थ" का मतलब है 'को समर्पित, में व्यस्त' । सभी आश्रमों में गृहस्थ को ही सबसे ज़्यादा अहमियत दी जाती थी और आज भी इसी को ही सबसे अहम माना जाता है। कई मतों के मुताबिक इंसान गृहस्थ में भोगी बन जाता है लेकिन गृहस्थ में ही इंसान करोबार, खेती बाड़ी या कोई भी काम करके अपनी जीविका चलाता है, खाने के साधन जुटाता है, धन, दौलत, जायदाद आदि इकट्ठा करता है जिनसे बाकी के आश्रमों का भी गुज़ारा होता है। इसी गृहस्थ से ही बच्चों का जन्म होता है, उनकी परवरिश और पढ़ाई लिखाई हो पाती है जिससे जाति, समाज और धर्म आगे बढ़ते हैं। इस आश्रम में इंसान 'धर्म', 'अर्थ', (धन-दौलत, जायदाद, जीविका) और 'काम' (प्यार, रिश्ते, भाव (emotions)) का पालन करता है। हमारे सिख धर्म में भी गृहस्थ को ही सबसे उतम माना गया है। गुरूनानक देव जी महाराज ने गृहस्थ को ही जिंदगी का आधार माना और इसको इतनी अहमियत दी कि उन्होंने अपने बड़े बेटे बाबा श्रीचन्द जी को जो हर लिहाज़ से बहुत ही लायक और काबिल थे उन्हें गुरू-गद्दी इसलिए नहीं दी क्योंकि उन्होंने शादी नहीं की और गृहस्थ का पालन नहीं किया । गुरूनानक देव जी महाराज के बाद सभी गुरू महाराज जी ने (सिवाय आठवें पातशाह गुरू हरिक्रिशन जी महाराज के जो बचपन में बहुत छोटी उम्र में ही ज्योति जोत समा गए थे) गृहस्थ का पालन किया। गुरूनानक देव जी महाराज के मुताबिक इंसान ना तो जंगलों में जाकर और ना ही भोग विकारों में पड़कर ईश्वर की प्राप्ति कर सकता है, बल्कि समझदार और अच्छा इंसान गृहस्थ में ही जिंदगी को मर्यादापूर्वक बिताते हुए बाकी सभी आश्रमों और अवस्थाओं का पालन कर सकता है।

 

शादी भोग का साधन नहीं है। शादी इंसानी जिंदगी की ज़िम्मेदारियों, कर्तव्यों और मकसद को पूरा करने का ज़रिया है। शादी पति-पत्नी को साथ (companionship), वफादारी, विश्वस्तता (fidelity), भरोसा, दोस्ती, सच्चाई, प्यार, अपनापन, स्थिरता और हर दुख, मुसीबत को और घर-परिवार को एक साथ रखने की हिम्मत और सामर्थ्य देती है। औरत को शादी के बाद सह- धर्मिनी कहा जाता है। यानि कि धर्म, ज़िम्मेदारियों और कर्तव्यों को साथ निभाने वाली । कहते हैं हर आदमी के अंदर, बहुत गहराई में एक औरत छुपी और हर औरत में एक आदमी छुपा हुआ होता है। गुरबाणी फरमान करती है :

"आपे पुरखु आपे ही नारी ।"

अक्सर हम शिवजी को अर्धनारीश्वर के रूप में देखते और जानते हैं । आदमी और औरत एक दूसरे के पूरक हैं। गुरबाणी के मुताबिक शादी का मकसद दो अलग शख्सियतों को, दो शरीरों और दिलों को एक आत्मा में बदलना है। तीसरे पातशाह गुरु अमरदास जी महाराज फरमाते हैं :

"धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ।,

एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ।। "

जो सिर्फ एक दूसरे के साथ बैठे हैं, रहते हैं, साथ चलते, खाते पीते हैं वो पति-पत्नी नहीं हैं। बल्कि वो जिनके दो शरीरों में एक ही आत्मा, एक ही जोत है, वो जो दूध और पानी की तरह आपस में घुल मिल कर एक हो गये हैं, जो सुख और दुख, खुशी और गम, दिन और रात, सर्दी और गर्मी, उतार और चढ़ाव में हमेशा साथ हैं, जिन्हें अलग नहीं किया जा सकता वो ही पति-पत्नी हैं। सिख धर्म के मुताबिक शादी पति-पत्नी को एक साथ रहकर, एक दूसरे के सुख दुख और ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए, मर्यादाओं भरी हुई एक संतुलित जिंदगी जीने का ज़रिया है। शादी दोनों के मन और सोच को एक जैसा कर, उनकी आत्मिक बढ़ोतरी कर उन्हें एक अटूट बंधन में बाँध देती है और शादी का असली मकसद है सहज रूप से गृहस्थ का पालन करते हुए परमपिता परमात्मा से जुड़ जाना।

मेरे विचार से शादी कोई बच्चों या गुड्डे-गुड़ियों का खेल नहीं है। यह एक बहुत ही संजीदा रिश्ता है जिसमें अगर लापरवाही बरती जाए ढंग से ध्यान ना दिया जाए और मेहनत ना की जाए तो यह दिन पर दिन पेचीदा होता चला जाता है। शादी का मतलब यह नहीं है कि आपका जीवनसाथी अल्लादीन का चिराग है जो आपकी हर ख़्वाहिश पूरी कर देगा। शादी का मतलब 24 घंटे खुलने वाली repair की दुकान या कोई annual maintenance contract नहीं है कि आपकी एक ही आवाज़ पर आपका साथी आपके सामने हाज़िर होकर आपके मन मुताबिक काम कर देगा। शादी के बाद हर नये दिन एक नया अनुभव, नया तर्जुबा होगा ऐसा भी नहीं है। आप एक ही साथी के साथ जब बहुत या सारा वक्त बिताएँगे तो हो सकता है आपको जिंदगी नीरस लगनी लगे। ये स्वाभाविक है। शादी खुद अपने आपको संतुलित और रोचक नहीं रख सकती। शादी self sustaining यानि कि खुद अपने आपको बनाए भी नहीं रख सकती। शादी में असहनशीलता, अधीरता की कोई जगह नहीं है। शादी का रास्ता टेड़ा-मेड़ा, ऊबड़-खाबड़ कई मुश्किलों, छोटी बड़ी तकरारों, नोंक-झोंक, गलतफहमियों और छोटे-मोटे झगड़ों से भरा हुआ होता है लेकिन अगर इंसान सही तरह से और समझदारी से यह रिश्ता निभाए तो अंजाम बहुत ही अच्छा हो सकता है। शादी इंसान को एक बहुत ही गहरा, प्यारा और intense intimacy यानि कि गहन आत्मियता का अहसास देती है। शादी का मतलब है कि आप किसी के ऊपर और कोई आपके ऊपर भरोसा करता है और निर्भर है, कोई आपका और आप किसी का इंतज़ार करते हैं, आपका हर सुख-दुख, अच्छा बुरा बाँटने और सहने के लिए कोई है। शादी का मतलब है तकरारें, गलतफ़हमियाँ, छोटे-बड़े झगड़े, रूठना, मनाना, माफ करना और माफी माँगना, सुनना, सुनाना और बहुत कुछ सीखना। शादी का मतलब है बहुत सारी सहनशीलता, वफादारी और समझदारी दिखाना, अपने साथी को समझना और इज्ज़त देना। शादी अनिश्चितताओं (uncertainties) से भरी होती है। शादी का सबसे बड़ा मतलब है compromise, compromise और compromise यानि कि अपने आपको लगातार ढालना और समझौता करना। शादी का एक मतलब है आपके साथी को आपको निराश और दुखी करने का हक मिल जाना लेकिन खूबसूरती यह है कि वही साथी वक्त-बेवक्त आपको जिंदगी की सबसे अच्छी और बड़ी खुशियाँ और सुख भी देता है। ईश्वर की प्राप्ति के बाद सबसे बड़ा सुख है औलाद का सुख, जो सही मायनों में शादी ही देती है। शादी का मतलब है commitment यानि कि वचनबद्धता और अपने आपको अपने साथी को सुपुर्द कर देना ।

आजकल की चकाचौंध, तेज़ रफ़्तार से दौड़ती और बदलती हुई जिंदगी, बदलते माहौल और पश्चिमी देशों की नकल ने आजकल के नौजवान लड़के-लड़कियों के दिमाग और जिंदगियों में गलत सोच भर दी है। अक्सर ये सवाल पूछा जाता है और चर्चाएँ की जाती हैं कि क्या शादी करना ज़रूरी है, शादी के क्या फायदे हैं ? जैसा कि मैंने आपको अब तक कई बार बताया है कि शादी ही वंश, जाति, समाज और धर्म को आगे बढ़ाती है। शादी से ही रीति रिवाज, परम्पराएँ और संस्कार आगे बढ़ते हैं। शादी इंसान को ज़िम्मेदार बनाती है। शादी की वजह से अच्छे और सुखी घर (homes and not houses) और परिवार बसते हैं और सुखी परिवारों का मतलब है खुशहाल जिंदगी और बच्चों की अच्छी परवरिश, पढ़ाई-लिखाई और सेहतमंद माहौल। शादी इंसान को हर रोज़ सुबह उठकर काम पर जाने और ज़िम्मेदारियाँ निभाने की हिम्मत और जोश देती है। शादी की वजह से जिंदगी भर के अनेकों रिश्तों की नींव पड़ती है। शादी ही इंसान को बुढ़ापे का सहारा दिलाती है। शादी की वजह से इंसान बहुत सारी गलत आदतों जैसे शराब, drugs, जुआ आदि से दूर रहता है और बहुत से लोग शादी की वजह से ही ऐसी बुरी आदतों की लत जल्दी ही छोड़ देते हैं। शादी से मिले मानसिक, शारीरिक और आत्मिक सुख, अनुभव और समझदारी बेमिसाल हैं। डार्ओटी, फैगन और मेकेएवेन अपनी एक रिर्पोट में लिखते हैं कि किसी भी देश के भविष्य की ताकत है वहाँ पर होने वाली अच्छी शादियाँ क्योंकि अच्छी शादियों की वजह से ही स्वस्थ और मज़बूत बच्चे, अच्छी सेहत और पढ़ाई-लिखाई के साधन, low crime यानि कि कम अपराध और Strong revenue यानि कि मज़बूत राजस्व, कर आदि निश्चित हो सकते हैं।

आज की इस भागदौड़ से भरी और लगातार बदलती हुई जिंदगी और खुदगर्जी के माहौल में शादी जैसे पवित्र और मज़बूत रिश्ते में लोगों का भरोसा कुछ कम हो रहा है । आजकल तलाक या divorce या शादी टूट जाने जैसे अनेकों किस्से सामने आ रहे हैं। मुझे पूरा यकीन और उम्मीद है कि यह एक बदलाव का माहौल है और जल्दी ही खत्म हो जाएगा। शादी जैसा संस्कार और परम्परा जो हज़ारों सालों से वक्त के थपेड़े सहकर आज तक अडिग रूप से चली आ रही है वो इस आधुनिकीकरण (modernisation) का तूफान भी सह जाएगी।

आइये अब रोशनी डालते हैं उन कुछ कारणों पर जिनकी वजह से शादी में अनबन और टूटने की नौबत आती या आ सकती है। शादी के पहले किए हुए झूठे वायदे या झूठे claims या छुपाए हुए कोई सच (झूठी बुनियाद पर टिकी हुई कोई भी शादी सच के सामने आते ही किसी भी घर और परिवार का विनाश कर सकती है। Infidelity यानि कि दाम्पत्य विश्वासघात पराए आदमी या औरत के साथ संबंध बनाना। Expectations trap यानि कि unrealistic, अवास्तविक, झूठी उम्मीदों के जाल में फँसना। किसी भी साथी में शारीरिक कमी या दोष का होना । दहेज, पैसे या सामान आदि का लालच । झगड़े, मारपीट, गाली-गलौच का होना (शराब, drugs, जुआ, वेश्यावृत्ति जैसी बुरी लतें, नाजायज़ शक करना, असहनशीलता और माफ ना करने की आदत) किसी भी प्रकार का छोटा-बड़ा compromise समझौता ना करना। झूठी शान या घमण्ड खुदगर्जी, ईर्ष्या, बेईमानी, सुस्ती, कामचोरी और character defects यानि कि चारित्रिक दोष। Lack of emotional intimacy यानि कि भावात्मक आत्मियता की कमी, अलग अलग विचार धाराएँ और अलग अलग जिंदगी जीने का ढंग । मैं ठीक हूँ, मुझे सबकुछ आता है और मुझे बदलने की ज़रूरत नहीं है ऐसी खोखली सोच। एक ऐसी ज़बरदस्त वजह जिसने अनगिनत शादीशुदा घर तबाह कर दिए वह है listening to third party यानि कि अपनी शादी, रिश्ते, जिंदगी और साथी के बारे में किसी भी इंसान चाहे वह कोई भी क्यों ना हो उसकी दखलअंदाज़ी interference को सहन करना, सुनना, बढ़ावा देना और मानना ।

मुझे अभी भी इस विषय पर आपके साथ और बहुत से विचार साँझे करने हैं, इसलिए इस पर बाकी की चर्चा अगले अंक में करेंगे। आखिर में मैं आपको बताना चाहूँगा कि सिख दर्शन (philosophy) के अनुसार इंसान की आत्मा दुल्हन है, पत्नी है और परमपिता परमात्मा उसका पति हैं । यह प्रियतमा यानि कि आत्मा अपने प्रीतम, अपने पति परमेश्वर परमपिता परमात्मा से बिछड़ा हुआ हिस्सा है जैसे उँगली और नाखून एक ही हैं वैसे ही आत्मा और परमात्मा भी एक हैं। आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन ही इंसान को जीवन मृत्यु के चक्र से बचाता है।

"साई सोहागणि ठाकुर धारी ।"

प्यारी साध संगत जी, आप सब सेवा और सिमरन करते हुए अपनी सोच, मन और आत्मा को शुद्ध करते हुए अपने जीवनसाथी के साथ एक होकर अपने सभी कर्तव्यों और ज़िम्मेदारियों को निभाते हुए परमात्मा की साधना में आगे बढ़ें और अपने बच्चों को भी सेवा, सिमरन, गुरूघर और शादी की अहमियत से वाकिफ़ करवाएँ।

और हमेशा याद रखें “No relationship is all sunshine, but two people can share one umbrella and survive the storm together." हमेशा की तरह मुझे आपके विचारों और सुझावों का इन्तज़ार रहेगा और खास तौर पर गुरसंगत में होने वाली शादियों के बारे में जिसके ऊपर मैं अगले या उससे अगले अंक में चर्चा करूँगा ।


वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
गुरसंगत का दास
संतरेन डाॅ० हरभजन शाह सिंघ, गद्दी नशीन