संदेश

 

संख्या: 16

 

प्यारी साध संगत जी,

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरू जी की फतेह |

इस बार हम “संस्कार” पर चर्चा करेंगे।

संस्कार  

हमारी तहज़ीब में किसी भी इंसान की पहचान उसके रूप-रंग, जाति, कपड़ों, मकान या धन-दौलत से नहीं बल्कि उसके संस्कारों से होती है। इंसान के संस्कार ऊँचे हों तो वह छोटा होकर भी उच्च आदर्श (standards) स्थापित कर जाएगा। पर अगर उसके संस्कार निम्न (low) हैं तो वह ऊँचे कुल में पैदा होने के बावजूद भी कुलीन (noble) नहीं कहलाता। इंसान तभी शोभनीय बनता है जब वह संस्कारित होता है, उसकी जिंदगी संस्कारों से भरी होती है।

संस्कार संस्कृत का शब्द है और इसका मूल अर्थ है सम यानि कि अच्छे और कार यानि कि काम अर्थात अच्छे काम। यह एक शब्द समुद्र की तरह गहरा और बहुत फैला हुआ है। इसके बहुत सारे अर्थ हैं और सभी एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। संस्कार का मतलब है सुधारना; शुद्धि; सफाई; सजाना; व्यवस्थित करना; अनुष्ठान, धार्मिक क्रिया; रिवाज, रस्म, रीति; दीक्षा; मन पर पड़ी छाप; किसी चीज़ को ठीक या दुरूस्त करना; किसी चीज़ की त्रुटियाँ, दोष आदि दूर करके उसको फायदेमंद और निरमल बनाने की क्रिया; किसी प्रकार की असंगति, भद्दापन आदि दूर करके उसे शिष्ट और सुन्दर रूप देने की क्रिया, धो, पोंछ, माँजकर साफ-सुथरा करना; किसी को सभ्य, समर्थ या उन्नत आदि करने के लिए कुछ बताने, सिखाने या अच्छे रास्ते पर लाने की क्रिया आदि। अंग्रेज़ी में इसके मतलब हैं ritual, rite, sacrament, ordination, purification, refinement, ceremony, encultration. अगर हम संस्कार को रीति-रिवाज, धार्मिक किया, अनुष्ठान या दीक्षा की नजर से देखें तो हिन्दू धर्म में इंसान के जन्म से पहले से लेकर मौत के बाद तक सोलह संस्कार किए जाते हैं जैसे कि गर्भाधान, पुंसवन, जातक्रम नामकरण, चूडाकर्म, यज्ञोपवीत, विवाह, अन्तयेष्टि आदि। ईसाई धर्म में baptism, ईसाई दीक्षा भी एक संस्कार है।

लेकिन आज हम जिस संस्कार की बात कर रहे हैं वह हैं इंसान के अच्छे काम, सदगुण, अच्छा आचरण, अच्छी सोच जो इंसानी जिंदगी का अस्तित्व है। इंसान संस्कारों का ही पुतला है। हालांकि संस्कार कोई जड़ वस्तु नहीं है एक आभास मात्र ही है जिसका हमारी पाँचों ज्ञानेन्द्रियों से सीधा संबंध है। संस्कार एक न दिखाई देने वाली प्रबल ऊर्जा है, प्रेरणा का स्त्रोत है। इंसान के द्वारा किए गए पाप और पुण्य के लिए संस्कार ही पूरी तरह से ज़िम्मेदार हैं। संस्कार इंसान के अवचेतन (subconscious) मन में इंसानी और नैतिक मूल्यों और मान्यताओं (human and moral values) के बीज बोना है और यहीं मान्यताएं और आदर्श जिंदगी भर उसकी क्रियाओं, गतिविधियों, कर्मों और फैसलों को अंजाम देते हैं। हमारी जिंदगी में बहुत से पुराने और नये संस्कार होते हैं जो बनते और खत्म होते हैं। हर इंसान के अपने-अपने संस्कार होते हैं। कुछ संस्कार आखरी वक्त तक इंसान के साथ रहते हैं और कुछ अगले जन्म तक आत्मा के साथ जाते हैं। भारतीय सभ्यता और धर्मों में पिछले जन्म और पुनर्जन्म की मान्यताऐं हैं। हमारी संस्कृति कर्म प्रधान है और पुनर्जन्म को मानने वाली है। पिछले जन्म में इंसान जो कर्म करता है वह वर्तमान या इस जन्म में उसका भाग्य बन कर आता है। संस्कार ही इंसान से सभी अच्छे और बुरे कर्म करवाता है। आध्यात्मिक दर्शन का मानना है कि इंसान के कर्म उसकी आत्मा के साथ बंध जाते हैं और उन्हीं कर्मों के अनुसार उसका पुनर्जन्म होता है इसलिए हर इंसान कर्म रूपी संस्कार लेकर पैदा होता है और उनको ही इंसान का पैदायशी स्वभाव या प्रकृति कहा जाता है। महावीर और महात्मा बुद्ध में जन्म-जन्मान्तर से सन्यास के संस्कार थे और उन्होंने भोग-विलास की हर चीज़ को त्यागकर अपने पूर्व जन्म के संस्कारों के असर में सन्यास को ग्रहण किया। इंसान जो प्रकृति जन्मजात लेकर पैदा होता है उसमें कुछ अच्छाईयाँ और बुराईयाँ होती हैं। इन्हीं प्राकृतिक तत्वों को संस्कारित करने की ज़रूरत होती है। अच्छाईयों को बढ़ाना और बुराईयों को खत्म करना ही संस्कार है।

संस्कार दो तरह के होते हैं भौतिक / सामाजिक (physical / social) और नैतिक / आध्यात्मिक (moral / intellectual). भौतिक / सामाजिक संस्कार दिखाई देने वाले हैं और धर्म, जाति, वक्त और स्थान आदि पर आधारित होते हैं जैसे कि हिन्दू संस्कार, ईसाई संस्कार, जैन और बौद्ध संस्कार, भारतीय या यूरोपीय संस्कार, भारत के अन्दर उत्तरी या दक्षिणी भारत के संस्कार आदि। लेकिन नैतिक / आध्यात्मिक संस्कार जो कि इंसान की अन्तरात्मा से संबंधित हैं वो जाति, धर्म और स्थान आदि से बहुत परे और ऊपर होते हैं और इंसान की मानसिक और आत्मिक शुद्धता और बढ़ोतरी के लिए, उसकी सोच और विचारों को सकारात्मक (positive) रखने के लिए, उसके सामाजिक और धार्मिक आचरण और कर्मों को सही और अच्छी दिशा में रखने के लिए बहुत ही जरूरी हैं। जिस तरह नींव के बिना इमारत टिक नहीं सकती वैसे ही संस्कारों के बिना इंसानी जिंदगी सही नहीं चल सकती। जैसे संस्कार वैसा ही आचरण। संस्कार ही इंसान को आसमान की बुलंदियों या फिर गुमनामी की खाईयों तक ले जाते हैं। पांडवों और कौरवों को द्रोणाचार्य जैसे गुरू और भीष्म पितामह और विदुर जैसे महान मार्गदर्शकों से एक समान दीक्षा और संस्कार मिले, लेकिन शकुनि जैसे चालबाज़ और ढोंगी ने कौरवों की सोच और संस्कारों का ऐसा नाश किया कि उनके बुरे कर्मों और संस्कारों की वजह से आज तक हमने किसी को भी अपने बच्चों के नाम दुर्योधन या दुःशासन रखते नहीं देखा और वहीं आज भी पांडव अपने अच्छे कर्मों और संस्कारों की वजह से नायक के रूप में दिलों में राज कर रहे हैं। सिर्फ नौ साल की छोटी सी उम्र में गुरगद्दी पर बैठने वाले गुरू गोबिंद सिंह जी महाराज के पूर्व जन्मों और माता-पिता के दिए हुए संस्कार ही थे जिनकी वजह से उन्होंने अपनी छोटी से दुनियावी यात्रा में ही बेमिसाल और अद्वितीय आदर्श कायम कर दिए।

गौतम ऋषि ने आठ गुणों के आचरण को संस्कारों का आधार बताया है और वह हैं दया, सहनशीलता, ईर्ष्या न करना, शुद्धता, शान्ति, सदाचरण, लोभ और लिप्सा (पाने की चाह, lust) का त्याग। हमारी जिंदगी की रचना के चार बुनियादी खम्बे (pillars) हैं 1) भाग्य, 2) पुरुषार्थ, 3) संस्कार और 4) संगति ।

भाग्य : पिछले जन्म में इंसान जो कर्म करता है वह वर्तमान में भाग्य बनकर आता है। भाग्य दिखता नहीं है। कहते हैं भाग्य या किस्मत अमिट होती है। लेकिन इंसान अपने पुरूषार्थ से उस पर असर डालकर उसको तीव्र या मंदा ज़रूर कर सकता है।

पुरुषार्थ : यानि कर्म करना। गीता में भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हैं कि कर्म करते चले जाओ और फल की इच्छा मत करो। अच्छे कर्म हैं तो कभी न कभी उनका फल ज़रूर मिलेगा। सिख धर्म भी कहता है कि इंसान को कर्म और सेवा निष्काम भाव से ही करने चाहिए। कर्मों का फल मिले या न मिले कभी निराश न हों, उसे ईश्वर की इच्छा समझकर, सकारात्मक होकर इंसान को अपने कर्म करते रहना चाहिए क्योंकि यही कर्म इंसान के आज / वर्तमान के भाग्य को बदलने की ताकत रखते हैं और भविष्य का भाग्य भी बनाते हैं।

संस्कार : यह इंसान की जिंदगी बनाते हैं और उससे अच्छे और बुरे कर्म पाप और पुण्य करवाते हैं और उसके भाग्य का फैसला करते हैं। जिंदगी में अच्छा-बुरा वक्त, ऊँच-नीच, सुख-दुख आते रहते हैं लेकिन संस्कारपूर्ण इंसान धैर्यपूर्वक हालातों का डटकर सामना करता है और आखिर में जीत उसकी ही होती है। आज भी हम जिस आदर्श राम-राज्य का उदाहरण देते हैं उसे प्राप्त करने के लिए भगवान श्री रामचन्द्र जी को चौदह साल का वनवास भोगना पड़ा, अनगिनत मुसीबतों का सामना करना पड़ा, दुख-दर्द सहने पड़े लेकिन उनके संस्कारों ने हमेशा उन्हें सही और धर्म के रास्ते पर रखा और आखिर में उन्होंने राम-राज्य स्थापित किया।

संगति : इंसान जिस संगति में रहता है वैसा ही बन जाता है। अगर कोई इत्र की दुकान पर जाएगा तो उससे इत्र की सुगन्ध आएगी और किसी शराब या कबाब की दुकान पर जाएगा तो उनकी दुर्गन्ध ही लेकर आएगा। संगति अच्छी हो या बुरी अपना असर ज़रूर छोड़ती है। हनुमान जी ने भगवान श्री रामचन्द्र जी की संगति की तो वानर होने के बावजूद भी ऐसे स्वामीभक्त बने कि देवताओं से भी ऊपर उठ गये और पूजे जाते हैं। वहीं पर द्रोणाचार्य जैसे महान गुरू और योद्धा को हालातों की वजह से दुर्योधन की संगति करनी पड़ी और मौत को गले लगाना पड़ा। अच्छी संगति अवगुणों को सदगुण और बुरी संगति सदगुणों को अवगुण में बदल देती है। अगर इंसान को अच्छे संस्कार और अच्छी संगति दोनों ही मिल जाएँ तो वह आदर्श बन जाता है।

"करि आचारु सचु सुखु होई"।।

(श्री गुरुग्रंथ साहिब जी)

अगर आप गौर करें तो पाऐंगे की श्री गुरूग्रंथ साहिब जी महाराज संस्कार अर्थात अच्छे कर्मों, नैतिकता और सदाचार का ब्रह्माण्ड हैं। इंसान की पूरी जिंदगी का कोई भी ऐसा सदगुण या संस्कार नहीं है जिसका वर्णन श्री गुरुग्रंथ साहिब जी महाराज में न हो। दया, संतोख, धीरज, निमरता, दान-पुण्य, सेवा, सिमरन, आस्था, परोपकार, इंसानियत आदि सभी सदगुणों और अच्छे कर्मों के समुद्र के समुंद्र श्री गुरुग्रंथ साहिब में समाये हुए हैं। इंसान को हर विकार, अवगुण और बुरे कर्मों से किस तरह बचना चाहिए और कैसे वह अपने रहन-सहन, जीवनशैली, सोच और लगन के साथ इन पर काबू पाकर इन्हें संस्कारों, सदगुणों और अच्छे कर्मों में तबदील कर सकता है ऐसी बेअन्त, बेमिसाल शिक्षाओं का महासागर हैं श्री गुरुग्रंथ साहिब जी महाराज।

जिस तरह ज़मीन पानी के बिना बंजर रहती है वैसे ही संस्कारों के बिना इंसान सिर्फ एक प्राणी ही बनकर रह जाता है। आज समाज में जो कुछ भी सुखद या दुखद घटता है तो इन सब में कहीं न कहीं इंसानी संस्कारों का बहुत बड़ा योगदान होता है। देवताओं और राक्षसों के बीच, सज्जन पुरुषों और दुष्टों के बीच का सबसे बड़ा फर्क है उनके संस्कार, इंसान के सभ्य बनने और उसके विकास में संस्कारों का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

• संस्कार इंसान के अवगुणों, दोषों, विकारों और नकारात्मक मानसिक प्रवृति (negative mental tendenies) को कम या खत्म करके उसमें नैतिक और इंसानी मूल्यों को विकसित कर उसे आम इंसान से एक असाधारण इंसान बना देते हैं।

• संस्कार इंसान के विचारों, सोच और आचरण को अच्छा कर देते हैं।

• यह इंसान की मानसिक, आत्मिक और आध्यात्मिक अवस्था को मजबूत कर देते हैं।

• यह इंसान के व्यक्तित्व (personality) का निर्माण और विकास करते हैं।

• यह इंसान को हमेशा सही और गलत में फर्क करने की क्षमता प्रदान करते हैं और उसे सही राह पर रखते हैं। उसके मन, तन और बुद्धि को भटकने नहीं देते।

• संस्कार सामाजिक मान्यताओं (values) और संस्कृति का निर्माण करते हैं।

• यह आने वाली पीढ़ियों और रीति-रिवाजों को कायम रखते हैं।

• परम्पराओं, संस्कृति, धर्म और समाज की जड़ों को मजबूत करके उन्हें संजो कर रखते हैं। यही नहीं बुरे और मुश्किल वक्त में उनकी रक्षा भी करते हैं।

• संस्कार ही इंसान, परिवार, वंश और जाति आदि की पहचान बनते हैं और उन्हें इज्जत बख्शवाते हैं।

• यह इंसान की जिंदगी में आने वाली बाधाओं और मुश्किलों को दूर करने में और उसकी लक्ष्य प्राप्ति में मदद कर उसके विकास में अहम भूमिका अदा करते हैं।

आज के ज़माने में विज्ञान और टेक्नोलोजी की तरक्की ने इंसान की जिंदगी और जीवनशैली को पूरी तरह से बदल कर रख दिया है। जिंदगी की तेज रफ्तार और बदलते हुए हालात संस्कृति, परम्पराओं और सदियों से चली आ रही मर्यादाओं को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। खुदगर्जी और ज़्यादा से ज्यादा पाने की चाह इंसान की फितरत सोच और मानसिकता को लगातार गिराती जा रही है। विज्ञान की उन्नति और अविष्कारों से इंसान को बहुत सी सुविधाऐं और साधन तो ज़रूर मिले हैं लेकिन उनकी वजह से वह सांस्कृतिक, सामाजिक और नैतिक मूल्यों से दूर होता जा रहा है। आज की शिक्षा-प्रणाली (education system) ज्यादा से ज्यादा पढ़ने पर, बहुत सारा और अलग-अलग किस्म का ज्ञान इकट्ठा करने पर, व्यवसाय (जीविका, career) पर, ज्यादा कमाने पर और सामाजिक मान मर्यादा पर तो केन्द्रित (focussed) है लेकिन संस्कार, अच्छे आचरण, परम्पराओं और स्वस्थ व संतुलित (healthy and balanced) जीवनशैली के बारे में बिल्कुल खामोश (निष्क्रिय, silent) है और विद्यार्थियों को सिर्फ ज़्यादा ज्ञान, जानकारी और नम्बर लाने वाली मशीन बनाने पर लगी है। आज विद्यार्थियों के व्यक्तित्व (personality) का विकास आधुनिक सोच और ज़रूरतों के मुताबिक तो हो रहा है लेकिन उसमें संस्कार और सदाचार आदि को कोई अहमियत नहीं दी जाती। नतीजा हर देश, हर धर्म और हर समाज के लोगों में लालच, असहनशीलता, ईर्ष्या-द्वेष, गुस्सा, अहम, खुदपसंदी और आसक्ति (infatuation) बढ़ती जा रही है और जन्म दे रही है शोक, कलह-कलेश, रोग, पाप, अपराध, शोषण, अपहरण, छल-प्रपंच, भ्रष्टाचार और अशान्ति को। हमारे जैसा देश जिसका आधार संयुक्त परिवार (joint family) था आज संस्कारों की कमी और बदलती हुई सोच और मानसिकता की वजह से तिनका तिनका होकर मूल-परिवार (nuclear family) पर आधारित होता जा रहा है जो सिर्फ माता-पिता और बच्चों तक ही सीमित होता है। संस्कारों की कमी, आधुनिक जीवनशैली और पश्चिमी देशों की संस्कृति के असर के चलते हमारे समाज और देश में बढ़ती हुई तलाकों और livein relationship की वजह से वह दिन भी दूर नहीं है जब मूल-परिवारों (nuclear families) का अस्तित्व भी खतरे में पड़ जाएगा। ज्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने, हर चीज़, सुख-सुविधा को हर हाल में जल्दी से जल्दी पाने की होड़ और आज के ज़माने के रहन-सहन की वजह से मानसिक (psychological) रोग, निराशा (depression) और आत्महत्या के मामले दिन पर दिन बढ़ते जा रहे हैं। संस्कारों की ही कमी है कि आज हमारे देश में वृद्धाश्रम (old age home) बढ़ने लगे हैं, हमारे बच्चे पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक और खेलकूद जैसे विषयों को छोड़कर भौतिकवादी (materialistic) चीज़ों जैसे कि mobile phones, सोशल मीडिया, ऊटपटांग कपड़ों, घूमने फिरने और फिज़ूलखर्ची आदि पर ज्यादा केन्द्रित होते जा रहे हैं। हमारे समाज में जहाँ कपड़े और वेशभूषा शालीनता की निशानी थी वहीं आज वह अंग प्रदर्शन का माध्यम बनते जा रहे हैं। छोटी उम्र में बढ़ते हुए यौन संबंध और शादीशुदा जिंदगियों में बढ़ रहे नाजायज रिश्ते (cases of infedelity) साफतौर पर दर्शाते हैं किस तरह संस्कारों की कमी हमें गरद में धकेलती जा रही है। वह वक्त ज़्यादा दूर नहीं है जब संस्कार और अच्छे आचरण की कमी की वजह से हमारी सदियों की संस्कृति और परम्पराऐं, हमारी ऐतिहासिक पहचान धूमिल और मन्द होकर इतिहास के पन्नों में सिमट जाएगी। आज हम बहुत ही गंभीर और नाजुक दौर से गुज़र रहे हैं जब हमारे सामने ही धीरे-धीरे हमारी सदियों की परम्पराओं, आदर्शों और नैतिक मूल्यों का पतन होता जा रहा है। आज ज़रूरत है आत्मविश्लेषण (introspection) और गहन चिन्तन की, कि किस तरह से विनाश की इस आँधी को रोककर एक बार फिर से हम सदाचार, संस्कारों, सादगी, शान्ति और भाईचारे को अपने परिवार, समाज और देश का आधार बनाऐं । संस्कार स्थापित करने, सीखने और सिखाने का सबसे अच्छा और असरदार वक्त है बचपन (बाल्यावस्था, childhood). कहते हैं पैदा होने से लेकर बच्चे की दस साल तक की उम्र संस्कार देने के लिए सबसे उतम और सही वक्त है। हमारी संस्कृति और सभ्यता में तो यह माना जाता है कि औरत की गर्भावस्था से ही बच्चे में संस्कार जन्म लेने लगते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि औरत को गर्भावस्था के वक्त साफ-सुथरा और संतुलित रहन-सहन, पौष्टिक और सात्विक खाना, पाठ-पूजा सिमरन, अच्छा साहित्य पढ़ना और अच्छी संगति में उठना-बैठना चाहिए। इंसान को संस्कार माता-पिता से मिलते हैं और घर ही संस्कार की जन्म स्थली है। बच्चे के पहले गुरू माता-पिता होते हैं। जब वह घर से बाहर निकलता है, स्कूल आदि जाता है तो वह अपने शिक्षक, साथी बच्चों, दोस्तों, पड़ोसियों, रिश्तेदारों और आसपास के समाज से संस्कार और आदतें सीखनी शुरू कर देता है। संस्कार का बनना एक ऐसी प्रक्रिया (process) है जो किसी का अनुसरण कर, किसी से सीखकर या देखकर ग्रहण करने, अपनाने से बनते हैं। बार-बार एक ही क्रिया (activity) का होना और उसका अनुसरण करना एक नये संस्कार को जन्म देता है। संस्कार की नींव है अनुशासन (नियम, discipiline). प्रकृति (nature) और इंसान की जिंदगी का सही तरीके से चलना सिर्फ अनुशासन पर ही कायम है। सूरज, चाँद और मौसम अनुशासन में रहते हैं और करोड़ों सालों से चले आ रहे हैं। धरती पर इंसान का जानवरों से अलग होना और लगातार उसका और उसकी जिंदगी का विकास होना अनुशासन का ही नतीजा है। बच्चों को अनुशासन का मतलब और अहमियत समझाएं और उनकी हर क्रिया (activity) को अनुशासित रखें। सबसे पहले माता-पिता अपने जीवन के हर पहलू को अनुशासित करें तभी जाकर बच्चे भी अनुशासित रहेंगे। अनुशासन के बिना संस्कार विकसित नहीं किए जा सकते। माता-पिता खुद भी सदाचार का पालन करें, संतुलित और स्वस्थ जीवनशैली अपनाऐं, बच्चे अपने आप उनका अनुसरण करने लगेंगे और अच्छी आदतें और आचरण उनके अवचेतन (subconscious) मन पर अपनी छाप बनाने लगेंगे और जन्म देंगे संस्कारों को। अपने बच्चों को : • शुरू से ही अच्छे और बुरे का सही और गलत का फर्क समझाऐं। परिवार, समाज, गुरूघर और धर्म के आचरण, शिक्षाओं और मूल्यों (values) का ज्ञान दें।

• पढ़ाई, सदाचार और नैतिक मूल्यों (moral values) से उन्हें अच्छी तरह से अवगत करवाएं और सही और नेक रास्ते पर चलने की शिक्षा दें।

• उनके चरित्र (character) निर्माण पर बहुत अधिक जोर दें।

• बहुत ज़रूरी है बच्चों को शुरू से ही स्वावलंबी (self-dependent) होना सिखाऐं। सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक उनको हर काम खुद करना सिखाएं और उनपर कड़ी निगाह रखें। आत्म-निर्भरता उन्हें उनकी ज़िम्मेदारियों का एहसास करवा देगी और बचपन से ही एक ज़िम्मेदार इंसान बनने में बहुत मददगार साबित होगी ।

• उन्हें वक्त की अहमियत और पाबंदियों का ज्ञान दें और हर काम वक्त पर पूरा करने की शिक्षा दें।

• दया, उदारता, त्याग और बाँटना सिखाएं। कृतज्ञता (gratefulness) व्यक्त करना सिखाऐं ।

• पैदा होते ही उन्हें गुरूघर से जोड़ें। उन्हें गुरू, गुरूघर और गुरसंगत के बारे में ज्ञान दें। गुरूघर के इतिहास और मर्यादाओं से परिचित करवाऐं। उन्हें अपने साथ हर यज्ञ साहिब और गुरघर के हर कार्यक्रम पर लेकर आएं और गुरूघर में चलने वाली नवयुवामण्डल की क्रियाओं में शामिल करें ।

• उनमें आस्था और भक्ति के बीज बोऐं और सेवा, सिमरन व अरदास के तरीकों और अहमियत से रूबरू करवाते रहें और लगातार उनका अभ्यास करवाते रहें। बचपन से ही उन्हें नितनेम करना सिखाऐं ।

• गुरसंगत के लिए निर्धारित की गयी जीवनशैली पर खुद भी अमल करें और शुरू से ही बच्चों को भी उसपर चलने की प्रेरणा दें।

• हर इंसान बराबर है उन्हें ऐसा सिखाऐं और पेड़-पौधों, वनस्पति और पशु-पक्षियों के प्रति इज्जत और करूणा भाव रखने की शिक्षा दें। उनमें प्रकृति की देखभाल और रक्षा करने का भाव पैदा करें।

• उन्हें साफ-सफाई, hygiene, अच्छी सेहत, संयमित खेलकूद और कसरत आदि के बारे में जागरूक करें और संगीत, लिखने और painting आदि कलाओं के प्रति उत्साहित करें।

• बहुत ज़रूरी है कि उनकी संगत पर विशेष ध्यान दें। संस्कार अच्छी और बुरी संगत से बहुत जल्दी और बहुत ज्यादा प्रभावित होते हैं। प्रहलाद हिरण्याक्ष जैसे दैत्य जो भगवान विष्णु का परम बैरी था उसका बेटा होने के बावजूद भी भगवान विष्णु का सबसे प्यारा भक्त बना क्योंकि उसका लालन-पालन नारद जी के आश्रम में हुआ था और उसके दैविक संस्कारों ने उसे अमर कर दिया ।

आज से पाँच साल पहले मैंने नवयुवामण्डल की शुरूआत की थी, उम्मीद करता हूँ कि अब आप समझ गये होंगे कि उसकी क्या वजह थी। इस बात पर मैं बहुत दृढ़ता से यकीन करता हूँ कि अगर हमें अपनी संस्कृति, परम्पराऐं, अस्तित्व और सोच को जिंदा रखना है और गुरसंगत को मजबूत करके आगे बढ़ाना है तो हमें अपने सभी बच्चों को शिशु अवस्था से ही गुरूघर के संस्कार सिखाने होंगे, उन्हें पैदा होते ही गुरूघर के आदर्शों, मर्यादाओं और मान्यताओं से वाकिफ करवाना होगा, उन्हें शुरू से ही गुरूघर की हर क्रिया (activity) का exposure (विवरण, प्रदर्शन) देना होगा। लेकिन यह काम सिर्फ मैं या गुरूघर ही पूरा नहीं कर सकता। गुरसंगत के हर माता-पिता और परिवार का यह कर्तव्य और जिम्मेदारी है कि अपने परिवार के हर बच्चे चाहे वह बेटा-बेटी या नाती-नातिन हों उन्हें अच्छे संस्कार दें, जन्म से ही गुरूघर से जोड़ें, गुरूघर के और अन्य संस्कारों से संवारें। जैसा कि मैंने पिछले संदेश में जो कि 'आचरण’ के ऊपर था उसमें कहा था कि हमारी जीवनशैली सदाचार और संस्कारों का खज़ाना और मार्गदर्शक (guide) है। अगर आप उसका सही और गम्भीरता से अनुसरण करें तो आपकी जिंदगी हमेशा सच्चाई और धर्म के रास्ते पर रहेगी और कोई भी मुसीबत आपके आत्मविश्वास, आस्था और मनोबल के सामने टिक नहीं पाएगी और आपकी जिंदगी खुदबखुद संस्कारों से भर जाएगी।

अगर आप अपने आप में किसी भी संस्कार को पैदा करना या अपनाना चाहते हैं तो फिर कोई भी उम्र, वक्त या स्थान मायने नहीं रखता। सिर्फ आपकी इच्छा शक्ति, लगन, अनुशासन और लगातार उस अच्छी आदत या संस्कार का अनुसरण ही आपको उससे सुसज्जित कर देगा। संस्कार किसी कुल, वर्ण या जाति के मोहताज नहीं होते। राजा बलि ने दैत्य होने के बावजूद भी अपने अच्छे कर्मों और संस्कारों की वजह से भगवान विष्णु को वामनावतार लेने के लिए और उन्हें छलपूर्वक हराने के लिए मजबूर कर दिया। वहीं रावण जैसा महापंडित जो पुलस्त्य ऋषि का पौत्र (पोता) था, वह ब्राह्मण कुल में पैदा होने के बावजूद अपने कर्मों और संस्कारों की वजह से एक महाराक्षस बन गया।

हमेशा याद रखें कि आपके संस्कार ही आपको अच्छे या बुरे कर्मों के लिए प्रेरित करते हैं और आपके यही कर्म भाग्य बनकर आपकी जिंदगी का फैसला करते हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि आप सब इस संदेश से सीख लेकर और हमारी जीवनशैली को अपनाकर, असका अनुसरण करके अपनी जिंदगी को अच्छे कर्मों और संस्कारों से सजाऐंगे और दूसरों को भी संस्कारों की अहमियत से वाकिफ करवा उन्हें भी सदाचार और नेक रास्ते पर चलने की सलाह देंगे।

"सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु"।

(श्री गुरुग्रंथ साहिब जी)

 

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
गुरसंगत का दास
संतरेन डाॅ० हरभजन शाह सिंघ, गद्दी नशीन