संदेश

 

संख्या: 8

 

प्यारी साध संगत जी,

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।

पिछले संदेश में मैंने आपको गुरू, शिष्य और उनके संबंधों के बारे में बताया था। उसी विषय को आगे बढ़ाते हुए इस बार हम गुरु आज्ञा पर चर्चा करेंगे।

गुरु आज्ञा  

गुरु की आज्ञा में रहे, गुरू की मति को धार |

तिस सेवक के काज सब, सदगुरू देत सवार ।।

गुरु आज्ञा यानि कि गुरू का हुक्म, आदेश, निर्देश, order, command. गुरू की कृपा प्राप्त करने का सबसे उत्तम और असरदार तरीका है गुरू की हर आज्ञा का पालन करना। गुरु के मुख से निकले हर शब्द, हर वाक्य का महत्व होता है और अगर वह शब्द या वाक्य आज्ञा के रूप में प्रकट हो तो उसमे कोई न कोई भलाई का संदेश या महत्वपूर्ण रहस्य अवश्य ही होता है। एक सच्चे और आदर्श सेवक या शिष्य का सबसे अच्छा गुण या quality है गुरु आज्ञा को ब्रह्म वाक्य मानकर उसे सर माथे पर रखकर उसका हर हाल में पालन करना। बहुत बार शिष्य को गुरु की आज्ञा का कारण या मकसद मालूम नहीं होता या समझ नहीं आता, लेकिन अगर वो एक समझदार और सच्चा शिष्य है तो वह यह ज़रूर समझता है कि उस आज्ञा का पालन करने में कोई न कोई भलाई ज़रूर है और वह उसे पूरा करने में जुट जाता है।
गुरु आज्ञा में निस दिन रहिए, जो गुरू चाहे सोई सोई करिए।

गुरू की हर आज्ञा का पालन करना शिष्य का सबसे पहला फर्ज़ और धर्म है। लेकिन गुरु की आज्ञा का पालन वो ही कर सकता है जिसे अपने गुरु की हर बात, कर्म और करनी पर पूरा भरोसा है। जिसके दिल और दिमाग में गुरू के लिए रत्ती भर भी शक नहीं है।

उबरे सतिगुर चरनी लागि ।

जो गुरु कहै सोई भल मीठा मन की मति तिआगि ।।

 

गुरू नानक देव जी महाराज ने चाहे कीचड़ में से कटोरा निकालने का या आधी रात को कपड़े धोने का या फिर मुर्दा खाने का हुक्म दिया, बिना किसी झिझक, शक या सोच विचार किये भाई लहणा जी (दूसरी पातशाही) ने गुरू महाराज जी की हर आज्ञा का पलक झपकते ही पालन किया और आने वाली पीढ़ियों और नस्लों को यह सीख दे डाली कि गुरु की आज्ञा को पूरा करने के लिए किसी भी प्रकार के तर्क, बुद्धि (logic, intellect) या विचार की ज़रूरत नहीं है। जहाँ बुद्धि और तर्क आ जाते हैं वहाँ शक खुद बखुद आ जाता है। कई बार गुरू आज्ञा बहुत मुश्किल या भारी लगती है और शिष्य उसे सिर्फ गुरू के या किसी अनहोनी के डर के कारण ही पूरा करने की कोशिश करता है। गुरु अंगद देव जी महाराज ने हमें यह भी शिक्षा दी कि डर के कारण उपजी आज्ञाकारिता (आज्ञा को पूरा करने की काबिलियत) बहुत योग्य नहीं होती। आज्ञाकारिता वही उत्तम है जो बिना कोशिश या दिखावे के, अपने गुरू के लिए बिल्कुल निर्मल प्रेम के कारण उपजे और जिसका वजूद आस्था पर टिका हुआ हो। जब गुरू अमरदास जी महाराज ने थड़ा बनाने का हुक्म दिया तो भाई जेठा जी (चौथी पातशाही) गुरू अमरदास जी महाराज के हर बार थड़े को नापसन्द करने के बावजूद बिना किसी सवाल, शिकन और शक के नया थड़ा बनाने में लग जाते और आखिर में न सिर्फ उन्होंने गुरू महाराज जी का दिल ही जीत लिया बल्कि गुरु की आज्ञा को कैसे माना जाता है इसकी ज़बरदस्त मिसाल कायम कर दी। गुरू अमरदास जी महाराज को थड़े की ऊँचाई, लम्बाई या सुन्दरता से कोई मतलब नहीं था। वह तो अपने शिष्यों की गहराई, धीरज और आज्ञा पालन की काबिलियत माप रहे थे।

गुरू कहे सो कार कमावे, गुरू की करनी कहे धावे ।

गुरु आज्ञा माने सो साधू, गुरु की आज्ञा पद भेद अगाधु ।।

गुरु की आज्ञा को पूरा करने की हिम्मत और क्षमता उसी आज्ञा में समाई होती है। गुरू कभी भी ऐसी आज्ञा नहीं देता जिसे पूरा करना मुमकिन ना हो। हालाँकि कई बार गुरु की आज्ञा शिष्य का इम्तिहान लेने के लिए होती है। शिष्य को भी कई बार गुरु की आज्ञा का पालन करना नामुमकिन या बहुत मुश्किल लगता है लेकिन गुरू खुद ही शिष्य को उसके भाव अनुसार रास्ता भी दिखाता है और आज्ञा को पूरा करने की हिम्मत भी देता है।

गुरु आज्ञा ले आवही, गुरू आज्ञा ले जायी।

कहे कबीर वा दास फिर, बहु बिधि अमृत पायी ।।

गुरु की कृपा के लायक बनने और उसकी आज्ञा को पूरा करने के लिए शिष्य में भी कुछ गुण या qualities का होना बहुत ज़रूरी है। इन गुणों में सबसे पहला है आस्था का होना। अपने गुरु में पूरी आस्था और अटल विश्वास हर शिष्य को सही फैसला लेने और सही रास्ता चुनने में मदद करते हैं। दूसरा गुण है सेवा भाव जो शिष्य को हिम्मत देता है।
नानक जो गुरु सेवहि आपणा हउ तिन बलिहारै जाउ ।

भक्ति और नम्रता उसे गुरू के करीब ले जाते हैं। आखिर में अहम (ego) का नाश और पूर्ण समर्पण (complete surrender) उसे हर मुश्किल और चुनौती को पार कर गुरू की हर आज्ञा का पालन करने का बल और क्षमता प्रदान करता है। गुरू की आज्ञा पर विचार नहीं सिर्फ अमल होना चाहिए।

गुरू का कथन मान सब लीजे । सत्य असत्य विचार न कीजे ।।

जब गुरू रामदास जी महाराज ने लाहौर में एक शादी में जाने के लिए हुक्म दिया और पृथीचंद और महादेव ने उसे नहीं माना तो गुरू महाराज जी ने अर्जन देव जी (पाँचवी पातशाही) को हुक्म दिया कि आप लाहौर जाओ और जब तक बुलाया न जाए वापिस मत आना। अर्जन देव जी (पाँचवी पातशाही) ने अपने गुरूपिता के हुक्म की पूरी तामील की और उनके विरह में खत लिखते लिखते गुरबाणी की महान रचनाओं की भी शुरूआत कर दी और गुरु की आज्ञा का मर्यादापूर्वक पालन करने की एक और नायाब मिसाल कायम कर दी। गुरबाणी फरमान करती है :

गुर कै ग्रिहि सेवकु जो रहै। गुर की आगिआ मन महि सहै ।।

आपस कउ करि कछु न जनावै। हरि हरि नामु रिदै सद धिआवै ।।

मनु बेचै सतिगुर के पासि । तिसु सेवक के कारज रासि ।।

 

ऐसा नहीं है कि सिक्ख धर्म में गुरूआज्ञा मानने में सिर्फ गुरूओं ने ही मिसालें दी। गुरू के सिक्ख भी समय-समय पर गुरु आज्ञा का पालन कर इतिहास को रोशन करते रहे। भाई सोमा जी छोटी सी उमर में गुरू रामदास जी महाराज की आज्ञा का पालन करते हुए उन्हें बिना किसी शक और सवाल के अपनी रोज़ की कमाई अर्पित करते रहे और उनकी खुशियाँ प्राप्त कर भाई सोमा शाह हो गये। भाई तीर्था जो बाद में भाई मन्झ के नाम से जाने गये उन्होंने गुरू अर्जन देव जी महाराज की हर आज्ञा का पालन करते हुए अपनी दौलत, शानो शौकत और आराम की जिंदगी त्याग कर, अनेकों भारी मुश्किलें और चुनौतियाँ पार कर दुनिया को यह दिखा दिया कि किस तरह से अपने गुरू महाराज पर ज़बरदस्त आस्था और पूर्ण समर्पण से गुरू की मुश्किल से मुश्किल और नामुमकिन लगने वाली आज्ञा पूरी की जाती है। जब गुरू अर्जन देव जी महाराज ने यह सुना कि भाई मन्झ कुँए में गिर गये हैं तो वह नंगे पैर कुँए तक दौड़ते चले गये और भाई मन्झ के कुँए से बाहर निकलते ही उन्हें अपनी बाहों में भरकर उचारा "मन्झ प्यारा गुरू को, गुरू मन्झ प्यारा ।। मन्झ गुरू का बोहिथा, जग लंघणहारा।।” गुरू हरगोबिन्द जी महाराज की आज्ञा का पालन करते हुए भाई गुरदास जी एक बन्दी के रूप में बनारस से चलकर गुरू महाराज जी के सामने पेश हुए। भाई नन्द लाल जी ने गुरू गोबिन्द सिंह जी महाराज के हुक्म का पालन करते हुए पूरी दुनिया को लंगर चलाने की मर्यादा सिखा दी। स्वामी गंगाधर जी को अपने गुरू परमहंस संत श्री सुखदेव शाह जी महाराज का हुक्म हुआ कि उन्होंने सिन्ध दरिया को पार नहीं करना है तो गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए उन्होंने अपनी अस्थियों को भी हरिद्वार नहीं जाने दिया व उनकी इच्छा के मुताबिक उनकी अस्थियाँ सिन्ध दरिया में ही बहा दी गयीं। गुरू के ऐसे महान आज्ञाकारी सिक्खों को पूरी दुनिया श्रद्धा से झुककर नमस्कार करती है। कहते हैं कि गुरु की इच्छा भी गुरु आज्ञा ही होती है। गुरू के द्वारा किसी भी रूप में, किसी भी इच्छा का प्रकट किया जाना अप्रत्यक्ष (indirect) रूप से गुरु आज्ञा ही है। पुराने ज़माने में शिष्य की शिक्षा पूरी होने के बाद गुरु दक्षिणा देने का रिवाज़ था। गुरु दक्षिणा देना शिष्य का फर्ज़ और कर्म था और गुरु दक्षिणा माँगना और लेना गुरू का अधिकार और धर्म था। गुरू दक्षिणा भी एक किस्म की गुरू आज्ञा ही थी। भगवान श्री कृष्ण ने अपने गुरू सान्दिपनि को कुदरत के कानून तोड़कर उनके मरे हुए बेटे को ज़िन्दा करके उन्हें गुरू दक्षिणा दी। एकलव्य ने गुरू द्रोणाचार्य की नाजायज़ गुरू दक्षिणा की माँग को पूरा करते हुए अपने दायें हाथ का अँगूठा काटकर उन्हें अर्पित कर दिया। पांडवों और अर्जुन का राजा द्रुपद से कोई बैर नहीं था, फिर भी उन्होंने राजा द्रुपद को बंदी बनाकर उसे गुरू द्रोणाचार्य को गुरु दक्षिणा के रूप में प्रस्तुत किया।

 

अगर गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए शिष्य को हौमे या अहंकार आ जाए तो ऐसी आज्ञाकारिता या आज्ञा का पालन करना गुरू को कभी भी रास नहीं आता। मिसाल के तौर पर भाई जोगा सिंह को जैसे ही गुरू गोबिन्द सिंह जी महाराज का हुक्म मिला तो वह अपने आनन्द कारज को बीच में अधूरा छोड़कर ही आनन्दपुर के लिए रवाना हो गया। लेकिन उसके मन में जल्दी ही यह अहंकार आ गया कि गुरू की आज्ञा का ऐसा पालन तो सिर्फ वो ही कर सकता है। उसका अहंकार तोड़ने के लिए गुरू महाराज जी ने ऐसी लीला रची कि रात भर कोशिश करने के बाद भी वह वेश्या तक नहीं पहुँच सका। अगले दिन जब वह गुरू महाराज जी के सामने पहुँचा तो उसका अहंकार ऐसा टूटा कि वह शर्म और गलती के अहसास (guilt) के कारण उनसे नज़रें भी ना मिला सका। गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए शिष्य को अपने यश, आदर सत्कार और इज्जत को भूलकर, निमाणा बनकर, आज्ञा को सर माथे रखकर पूरा करना चाहिए। हर बार गुरु की आज्ञा का पालन हो ऐसा भी नहीं है। ऐसी मिसालें भी हैं जहाँ पर गुरू आज्ञा का उल्लंघन किया गया और नतीजे पूरी दुनिया जानती है। श्रीचन्द जी का इतने विद्वान होने के बावजूद भी गुरू नानक देव जी महाराज की आज्ञा का पालन न करना या पृथीचंद का लाहौर ना जाना या रामराय जी का औरंगज़ेब को करामातें दिखाना उन्हें हमेशा हमेशा के लिए गुरू घर और गुरु गद्दी से दूर ले गया।

पूरे गुर का हुकम न मंनै ओहु मनमुखु अगिआनु मुठा बिखु माइआ ।

ओसु अंदर कूड़ु कूड़ो करि बुझै अणहोदे झगड़े दयि ओस दै गलि पाइआ ।।

बाबा अमरदास जी (तीसरी पातशाही) को सेवा के सातवें साल में गुरु अंगद देव जी महाराज ने सरोपे का प्रशाद उनके सर पर बाँधते बाँधते कहा कि आप कोई भी अच्छा या बुरा संकल्प नहीं करना, लेकिन बाबा अमरदास जी ने अगर गुरू महाराज जी का रिसता हुआ अंगूठा ठीक करने के लिए या अगर किसी की पुत्र प्राप्ति के लिए संकल्प किया या पापी तपे को उसके बुरे कामों के लिए सज़ा दिलवाई तो उन्हें भी अपने गुरूपिता की ताड़ना और नाखुशी ही मिली। गुरू नानक देव जी महाराज की इच्छा के बावजूद भी मूला खत्री उनके दर्शन करने ना जाकर घर में छुप गया तो उसे भी ना जाने कितनी जूनियों में भटकना पड़ा।

जो कोई गुर की आज्ञा भूले। फिर फिर कष्ट गरभ में झूले ।।


गुरु नानक देव जी महाराज फरमाते हैं :

किव सचिआरा होईऐ किव कूड़ै तुटै पालि ।

हुकमि रजाई चलणा नानक लिखिआ नालि ।।

सिर्फ मालिक का हुक्म ही हमें अधर्म और झूठ का पर्दाफाश करके सच्चाई, धर्म और सही रास्ते पर ले जा सकता है।

हुकमी होवनि आकार हुकमु न कहिआ जाई ।

हुकमी होवनि जीअ हुकमि मिलै वडिआई ।।

मालिक का हुक्म है तो यह मनुष्य रूपी जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन का हर पहलू मालिक के हुक्म और गुरु की आज्ञा पर टिका हुआ है।

गुरु की आज्ञा बिघ्न न कोई, गुरु की आज्ञा गुरमुख होई ।

गुरु की आज्ञा भक्ति बढ़ावे, गुरु की आज्ञा पार लगावे ।।

प्यारी साथ संगत जी,

जिस तरह एक उगते और बढ़ते हुए पौधे को सिर्फ बढ़ने का अधिकार होता है वह अपनी दिशा खुद नहीं चुन सकता; जैसे नदी को सिर्फ समुद्र में मिल जाना होता है वह भी अपने बहने की दिशा खुद तय नहीं कर सकती, वैसे ही हर इंसान और शिष्य को चाहिए कि वह भी अपने आप को मालिक और गुरू को सौंप दे और बिना किसी शक, सवाल जवाब या विरोध के उनके हुक्म और आज्ञा को अपनी जिंदगी का आधार और सहारा मानकर, उनकी रज़ा को मीठा मानकर, खुशी खुशी अपनी जिंदगी गुजार दे। ऐसा करने से ही गुरमुख जीवन की प्राप्ति, इच्छाओं और इन्द्रियों पर जीत, आत्मा की शुद्धि और पापों और विकारों का नाश और आखिर में जीवन और मौत के चक्र से छुटकारा मिलना निश्चित है। गुरबाणी फरमान करती है :

आगिआ तुमरी मीठी लागउ कीओ तुहारो भावउ ।

जो तू देहि तही इहु त्रिपतै आन न कतहू धावउ ।।

मैं तो कहता हूँ कि हर शिष्य, सिक्ख और सेवक को अपने गुरु की आज्ञा को ऐसे संभालकर पूरा करना चाहिए जैसे कि गुरू अमरदास जी महाराज अपने गुरू पिता के स्नान के लिए बहुत ही सावधानी से नदी से गागर में जल भरकर लाते थे। हमें भी चाहिए कि हम हृदय रूपी गागर में गुरु की आज्ञा रूपी जल को बहुत संभाल कर, बिना किसी छलकाहट के, बहुत सावधानी से उसकी पालना करें और गुरू महाराज की खुशियाँ और मेहर प्राप्त करें।

आगआ भई अकाल की तभी चलायो पंथ ।

सब सिक्खन को हुकम है गुरू मानयो ग्रंथ ।।

आइए हम सब श्री गुरू ग्रन्थ साहिब जी महाराज को हमेशा आदर पूर्वक नमन करते हुए, उन्हें अपने अंग-संग मानकर अपना सब कुछ उन पर वार दें और उनके हर वचन को सिर माथे पर रखकर अपनी ज़िंदगी के हर पहलू में उतारें और अपना जीवन सफल करें।

वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह।
गुरसंगत का दास
संतरेन डाॅ० हरभजन शाह सिंघ, गद्दी नशीन